
ईरान की राजधानी तेहरान से सामने आ रहे कई वीडियो से पता चल रहा है कि और दूसरे शहरों में बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे हैं.
इन वीडियो में बताया जा रहा है कि ये बीते कई सालों में धार्मिक सत्ता के विरोधियों की सबसे बड़ी ताक़त दिखाने वाले प्रदर्शन हैं.
गुरुवार शाम तेहरान और देश के दूसरे सबसे बड़े शहर मशहद में शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुए. इन प्रदर्शनों को सुरक्षा बलों ने नहीं रोका. बीबीसी फ़ारसी ने इन वीडियो की पुष्टि की है.
इसके बाद एक मॉनिटरिंग ग्रुप ने बताया कि पूरे देश में इंटरनेट बंद कर दिया गया.
12 दिनों से विरोध प्रदर्शन, कम से कम 22 लोगों की मौत

इन प्रदर्शनों के दौरान ख़ामेनेई के ख़िलाफ़ नारे लग रहे हैं (सांकेतिक तस्वीर)
मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक़, यह लगातार 12वां दिन था, जब देश में अशांति देखी गई.
यह विरोध ईरानी मुद्रा के गिरने से पैदा हुए ग़ुस्से के बाद शुरू हुआ और ईरान के सभी 31 प्रांतों के 100 से ज़्यादा शहरों और क़स्बों तक फैल गया.
अमेरिका स्थित ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट न्यूज़ एजेंसी (एआरएएनए) ने कहा है कि अब तक कम से कम 34 प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी है, जिनमें पांच बच्चे शामिल हैं.
इसके अलावा आठ सुरक्षाकर्मियों की भी मौत हुई है और 2270 प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार किया गया है.
नॉर्वे स्थित संस्था ईरान ह्यूमन राइट्स (आईएचआर) ने कहा है कि सुरक्षाबलों की कार्रवाई में कम से कम 45 प्रदर्शनकारी मारे गए हैं, जिनमें आठ बच्चे हैं.
बीबीसी फ़ारसी ने 22 लोगों की मौत और पहचान की पुष्टि की है. वहीं ईरानी अधिकारियों ने छह सुरक्षाकर्मियों की मौत की जानकारी दी है.
गुरुवार शाम सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए और बीबीसी फ़ारसी की ओर से वेरिफ़ाइड वीडियोज़ में देश के उत्तर-पूर्व शहर में मौजूद मशहद शहर की एक मुख्य सड़क पर बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी चलते हुए दिखे.
इन वीडियोज़ में “शाह ज़िंदाबाद” और “यह आख़िरी लड़ाई है, पहलवी लौटेगा” जैसे नारे सुने जा सकते हैं. एक जगह कुछ लोग एक ओवरब्रिज पर चढ़ते दिखते हैं और वहाँ लगे निगरानी कैमरों जैसे दिखने वाले उपकरण हटाते नज़र आते हैं.
ऑनलाइन पोस्ट किए गए एक दूसरे वीडियो में पूर्वी तेहरान की एक मुख्य सड़क पर भी बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी चलते दिखे.
तेहरान के उत्तरी हिस्से से बीबीसी फ़ारसी को भेजे गए फ़ुटेज में एक और बड़ी भीड़ को “यह आख़िरी लड़ाई है, पहलवी लौटेगा” के नारे लगाते सुना गया.
उत्तर के दूसरे इलाक़ों से मिले वीडियो में सुरक्षाबलों के साथ झड़प के बाद प्रदर्शनकारियों को “बेइज़्ज़त” और “डरो मत, हम सब साथ हैं” जैसे नारे चिल्लाते हुए देखा गया है.
सेंट्रल सिटी इस्फ़हान के एक वीडियो में प्रदर्शनकारियों की ओर से “तानाशाह मुर्दाबाद” के नारे सुनाई दिए, इनको सर्वोच्च नेता ख़ामेनेई से जोड़कर देखा जा रहा है. उत्तरी शहर बाबोल में “शाह ज़िंदाबाद” और उत्तर-पश्चिमी शहर तबरीज़ में “डरो मत, हम सब साथ हैं” के नारे लगते पाए गए हैं.
पश्चिमी शहर देज़फुल से बीबीसी फ़ारसी को भेजे गए फुटेज में बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी दिखे. वहां सुरक्षाकर्मियों को एक केंद्रीय चौक से गोली चलाते हुए भी देखा गया.
शाम के ये प्रदर्शन तब हुए हैं, जब वॉशिंगटन डीसी में रह रहे रज़ा पहलवी ने ईरानियों से कहा था कि वे सड़कों पर उतरें और एकजुट होकर अपनी मांगें बुलंद करें. रज़ा पहलवी के पिता को 1979 की इस्लामिक क्रांति में सत्ता से हटा दिया गया था.

ईरान के सरकारी मीडिया ने गुरुवार की अशांति के पैमाने को कम करके दिखाया है. कुछ मामलों में तो यह भी कहा गया कि कहीं कोई प्रदर्शन हुआ ही नहीं. इसके लिए ख़ाली सड़कों के वीडियो दिखाए गए हैं.
इसी बीच इंटरनेट पर नज़र रखने वाली संस्था ‘नेटब्लॉक्स’ ने कहा कि उसके आंकड़े दिखाते हैं कि ईरान “इस समय पूरे देश में इंटरनेट बंद होने की स्थिति में है.”
संस्था ने कई शहरों में इंटरनेट कनेक्शन बंद होने के मामले में चेतावनी देते हुए कहा, “यह घटना डिजिटल सेंसरशिप के उन क़दमों के बाद आई है, जिसमें देशभर में हो रहे प्रदर्शनों को निशाना बनाया गया. इससे एक अहम समय पर लोगों के आपस में संपर्क करने के अधिकार पर असर पड़ा है.”
इससे पहले दिन में पश्चिमी प्रांत इलाम के छोटे से शहर लोमार से आए वीडियो में लोग “तोप, टैंक, आतिशबाज़ी, मौलवियों को जाना होगा” के नारे लगाते दिखे. इस नारे को धार्मिक सत्ता से जोड़कर देखा जा रहा है. एक दूसरे वीडियो में लोग एक बैंक के बाहर काग़ज़ हवा में उछालते दिखे.
एक अन्य वीडियो में इलाम, केरमनशाह और लोरेस्तान प्रांतों के कई ज़्यादातर कुर्द आबादी वाले शहरों और क़स्बों में दुकानें बंद दिखीं.
यह घटनाक्रम निर्वासित कुर्द विपक्षी संगठनों की उस अपील के बाद सामने आया, जिसमें उन्होंने इलाक़े में प्रदर्शनों के दौरान हुई घातक कार्रवाई के विरोध में आम हड़ताल का आह्वान किया था.
कुर्द मानवाधिकार संगठन हेंगाव के मुताबिक़, अशांति के दौरान इलाम, केरमनशाह और लोरेस्तान में सुरक्षाबलों की कार्रवाई में कम से कम 17 प्रदर्शनकारियों की मौत हुई है. इनमें से कई कुर्द या लोर जातीय अल्पसंख्यक समुदाय से थे.
बुधवार को पश्चिमी ईरान के कई शहरों और क़स्बों में, साथ ही दूसरे इलाकों में भी प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच हिंसक झड़पें हुई थीं.
आईएचआर ने कहा कि यह अशांति का अब तक का सबसे घातक दिन था, जब पूरे देश में 13 प्रदर्शनकारियों की मौत की पुष्टि हुई.
संस्था के निदेशक महमूद अमीरी-मोग़द्दम ने कहा, “सबूत दिखाते हैं कि कार्रवाई हर दिन ज़्यादा हिंसक हो रही है और बड़े पैमाने पर फैलती जा रही है.”
हेंगाव ने बताया कि बुधवार रात उत्तरी प्रांत गीलान के खोश्क-ए-बिजार में सुरक्षा बलों ने दो प्रदर्शनकारियों को गोली मार दी.
रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के क़रीब माने जाने वाली ईरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी फ़ार्स ने कहा है कि बुधवार को तीन पुलिसकर्मी भी मारे गए.
एजेंसी के मुताबिक, दक्षिण-पश्चिमी शहर लोर्देगन में “उपद्रवियों” के एक समूह में शामिल हथियारबंद लोगों ने दो पुलिसकर्मियों को गोली मार दी. तीसरे पुलिसकर्मी की मौत तेहरान के पश्चिम में मलार्ड काउंटी में “अशांति को काबू में करने की कोशिश के दौरान” चाकू लगने से हुई.
ट्रंप दख़ल देने की दे चुके हैं चेतावनी

ट्रंप धमकी दे चुके हैं कि अगर प्रदर्शनकारियों पर कड़ा रुख़ अपनाया गया तो वो दख़ल देंगे
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को एक बार फिर चेतावनी दी थी कि अगर ईरानी अधिकारी प्रदर्शनकारियों को मारते हैं तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई कर सकता है.
ह्यू हेविट शो को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, “मैंने उन्हें बता दिया है कि अगर उन्होंने लोगों को मारना शुरू किया, जैसा कि वे अक्सर अपने दंगों के दौरान करते हैं, तो हम उन्हें बहुत क़रारा जवाब देंगे.”
इससे पहले ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने सुरक्षाबलों से शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से निपटने में “पूरी संयम बरतने की” अपील की थी. एक बयान में कहा गया, “किसी भी तरह के हिंसक या ज़बरदस्ती वाले व्यवहार से बचा जाना चाहिए.”
ईरान के सर्वोच्च नेता ख़ामेनेई ने शनिवार को कहा था कि अधिकारियों को “प्रदर्शनकारियों से बात” करनी चाहिए लेकिन “उपद्रवियों को उनकी जगह दिखानी चाहिए.”
ये प्रदर्शन 28 दिसंबर को तब शुरू हुए थे, जब तेहरान में दुकानदार सड़कों पर उतरे थे. वे खुले बाज़ार में अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले ईरानी मुद्रा रियाल की क़ीमत में तेज़ गिरावट से नाराज़ थे.
पिछले एक साल में ईरानी रियाल रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है और महंगाई 40 फ़ीसदी तक पहुंच चुकी है. ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर लगे प्रतिबंधों का असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा है, जो सरकारी बदइंतज़ामी और भ्रष्टाचार से पहले ही कमज़ोर थी.
‘हम मुश्किल में जी रहे हैं’

देश की ख़राब होती अर्थव्यवस्था को लेकर विरोध प्रदर्शन 12 दिन पहले शुरू हुए थे
जल्द ही विश्वविद्यालयों के छात्र भी इन प्रदर्शनों में शामिल हो गए और यह दूसरे शहरों तक फैल गया. भीड़ को अक्सर धार्मिक सत्ता के ख़िलाफ़ गंभीर नारे लगाते सुना गया.
ब्रिटेन स्थित एक कार्यकर्ता के ज़रिए बीबीसी को भेजे गए संदेशों में तेहरान की एक महिला ने कहा कि निराशा इन प्रदर्शनों की बड़ी वजह है.
उन्होंने कहा, “हम मुश्किल में जी रहे हैं. ऐसा लगता है जैसे मैं हवा में लटकी हूं, न कहीं जाने के पंख हैं और न यहां अपने सपनों को पूरा करने की उम्मीद. यहां ज़िंदगी असहनीय हो गई है.”
एक दूसरी महिला ने कहा कि वह इसलिए प्रदर्शन कर रही हैं क्योंकि धार्मिक सत्ता ने उनके सपने “छीन” लिए हैं. उन्होंने कहा कि वह यह दिखाना चाहती हैं कि “अब भी चीख़ने के लिए हमारे पास आवाज़ और चेहरे पर मारने के लिए मुक्का भी है.”
पश्चिमी शहर इलाम की एक महिला ने बताया कि वह ऐसे युवाओं को जानती हैं, जिनके परिवार सत्ता से जुड़े हैं और फिर भी वे प्रदर्शनों में शामिल हो रहे हैं. उन्होंने कहा, “मेरी दोस्त और उसकी तीन बहनें, जिनके पिता ख़ुफ़िया सेवाओं में एक जाना-पहचाना नाम हैं, पिता को बिना बताए प्रदर्शनों में जा रही हैं.”
ये प्रदर्शन साल 2022 के उस आंदोलन के बाद सबसे ज़्यादा फैले हुए हैं, जो हिरासत में महसा अमीनी की मौत के बाद शुरू हुआ था.
महसा अमीनी एक युवा कुर्द महिला थीं, जिन्हें सही तरीक़े से हिजाब न पहनने के आरोप में मोरेलिटी पुलिस ने पकड़ा था. मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक़, उस दौरान कई महीनों में 550 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई और 20,000 लोगों को हिरासत में लिया गया.
इस्लामी क्रांति के बाद सबसे बड़े प्रदर्शन साल 2009 में हुए थे, जब विवादित राष्ट्रपति चुनाव के बाद लाखों ईरानी बड़े शहरों की सड़कों पर उतर आए थे. उसके बाद की कार्रवाई में दर्जनों विपक्षी समर्थक मारे गए और हज़ारों लोगों को हिरासत में लिया गया.

