Home » ताजा खबरें » संपादकीय : लोकतंत्र – नाम बड़ा, दर्शन छोटा!

संपादकीय : लोकतंत्र – नाम बड़ा, दर्शन छोटा!

आज पूरी दुनिया में यह भ्रम फैलाया जाता है कि लोकतंत्र आधुनिक युग की सबसे महान खोज है। मानो इससे पहले मानव समाज अंधकार में जी रहा था। परंतु भारत के इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि लोकतंत्र, गणतंत्र और सुशासन की परंपरा पश्चिम से नहीं – भारत से निकली है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र, शुक्रनीति, महाभारत का शांति पर्व – सब प्रमाण देते हैं कि प्राचीन भारत में केवल एक प्रकार का शासन नहीं था, बल्कि अनेक प्रकार के शासन-तंत्र विद्यमान थे।

हिन्द न्यूज | लोकतंत्र | 10 फरवरी 2026 | पोस्टेड बाइ – जाहिद अली

प्राचीन भारत के नौ प्रमुख शासन-तंत्र
इतिहासकारों और धर्मशास्त्रों के अनुसार भारत में निम्नलिखित शासन प्रणालियाँ प्रचलित थीं –

राजतंत्र – एक राजा द्वारा संचालित शासन
गणतंत्र – जनता या प्रतिनिधियों का शासन
कुलतंत्र – कुलीन वर्ग या परिवारों का शासन
द्वैराज्य तंत्र – दो राजाओं द्वारा संयुक्त शासन
संघतंत्र – अनेक गणराज्यों का संघ
प्रजातंत्र / जनतंत्र – जनसभाओं द्वारा निर्णय
सामंत तंत्र – विकेन्द्रित स्थानीय शासन
धर्मतंत्र – धर्म और न्याय आधारित शासन
पंचायत तंत्र / ग्रामतंत्र – ग्राम सभाओं का स्वशासन
अर्थात भारत में शासन की विविधता थी।
आज का लोकतंत्र इन्हीं व्यवस्थाओं का एक आधुनिक संस्करण मात्र है – कोई नई खोज नहीं।

कौटिल्य ने स्पष्ट कहा था –
“प्रजा सुखे सुखं राज्ञः, प्रजानां च हिते हितम्।”
यानी – राजा का सुख प्रजा के सुख में है।

आज के लोकतंत्र में यह भावना कहाँ दिखती है?
🌍 आधुनिक लोकतंत्र की कड़वी सच्चाई
आज एशिया के अनेक देश लोकतंत्र के नाम पर गंभीर उथल-पुथल से गुजर रहे हैं।
🇧🇩 बांग्लादेश – चुनाव या तमाशा?

बांग्लादेश में हालात ऐसे हैं कि चुनाव तो हो रहे हैं, परंतु विपक्ष को लगभग हाशिये पर धकेल दिया गया है। पत्रकारों पर हमले, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदी, आर्थिक संकट – ये सब लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों की हत्या हैं।
लोकतंत्र यदि केवल मतदान का नाम बन जाए, तो वह लोकतंत्र नहीं – चुनावतंत्र बन जाता है।
🇱🇰 श्रीलंका – जनता ने सरकार पलट दी
श्रीलंका में महँगाई, भ्रष्टाचार और कुशासन ने जनता को सड़कों पर ला खड़ा किया। राष्ट्रपति भवन तक पर कब्जा हो गया।

यह घटना बताती है कि –
जब तंत्र जनता के काम न आए, तो जनता तंत्र बदल देती है।
प्राचीन भारत में यदि राजा अयोग्य होता था तो उसे पद से हटाने का अधिकार सभाओं और परिषदों के पास होता था।

आज वही काम सड़कों पर हो रहा है।
🇳🇵 नेपाल – युवाओं का विद्रोह
नेपाल में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ “Gen-Z आंदोलन” ने पूरी सरकार हिला दी। संसद भंग करनी पड़ी।

यह वही नेपाल है जहाँ कभी पंचायत व्यवस्था अत्यंत मजबूत थी।
पर आधुनिक लोकतंत्र वहाँ भी अस्थिरता का पर्याय बन गया।
🧭 भारत की स्थिति – तंत्र या उलझन?
अब अपने देश की ओर देखें।

आज भारत में कागज़ों पर सब कुछ शानदार है –
लोकतंत्र है
न्यायपालिका है
प्रशासन है
कानून है
लेकिन आम आदमी की हालत क्या है?
🔹 एक छोटा सा प्रमाण पत्र बनवाने में 20 दफ्तर
🔹 न्याय पाने में 20 साल
🔹 फाइल एक मेज से दूसरी मेज तक घूमती रहती है
🔹 अधिकारी जवाबदेह नहीं
🔹 “सिस्टम” के नाम पर नागरिक परेशान
काम छोटा – चक्कर पचास!
प्राचीन व्यवस्था से तुलना
प्राचीन भारत में –
ग्राम सभाएँ त्वरित निर्णय लेती थीं
न्याय सस्ता और सुलभ था
अधिकारी स्थानीय जनता के प्रति उत्तरदायी थे
राजा भी धर्म और लोकमत से बँधा था
आज?

फाइलें राज करती हैं
कानून कम, प्रक्रिया ज्यादा
जनता मालिक नहीं – याचक बन गई है
⚖ विधिक सच्चाई
संविधान में लिखा है –
“लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन है।”
पर व्यवहार में बन गया है –
“तंत्र का, तंत्र के लिए, तंत्र द्वारा शासन।”
जब तक –
न्याय त्वरित नहीं होगा
प्रशासन सरल नहीं होगा
अधिकारी जवाबदेह नहीं होंगे
कानून जनोन्मुखी नहीं होगा

तब तक लोकतंत्र केवल एक सुंदर शब्द ही रहेगा।
🖋 अंतिम कटाक्ष
भारत में प्राचीन काल में लोकतंत्र का मूल भाव था –
“राजा सेवक, प्रजा स्वामी।”
आज उलटा हो गया –
“प्रजा सेवक, तंत्र स्वामी।”
बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका की घटनाएँ चेतावनी हैं कि यदि लोकतंत्र केवल नाम का रह गया, तो जनता देर-सबेर उसे चुनौती देगी ही।
लोकतंत्र का अर्थ केवल पाँच साल में एक बार बटन दबाना नहीं –
बल्कि रोज़मर्रा के जीवन में सुशासन, न्याय और सम्मान का अनुभव है।
जब तक यह नहीं होगा, तब तक हर लोकतंत्र भीतर से खोखला ही कहलाएगा।

About Editor

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
Advertisement
Cricket Score
सबसे ज्यादा पड़ गई
Share Market

शहर चुनें

Follow Us