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समकालीन दक्षिण एशियाई लोकतंत्र : संकट का परिदृश्य |

बांग्लादेश — लोकतंत्र की कठोर परीक्षा
🔹 निर्वाचनों की संवैधानिक चुनौती:
बांग्लादेश में 2026 के फ़रवरी चुनाव लोकतंत्र की एक प्रमुख परीक्षा हैं, जहां 1.28 करोड़ से अधिक मतदाता शामिल होंगे, लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी/आन्दोलन को चुनाव से बाहर रखा गया है — यह लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा की भावना पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।

हिन्द न्यूज | बांग्लादेश | 10 फरवरी 2026 | पोस्टेड बाइ – जाहिद अली

 

सत्ता-विरोधी माहौल:
राजनीतिक तनाव और विपक्ष तथा नागरिक समाज की आवाज़ बढ़ रही है, जिससे लोकतंत्र की स्थिरता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

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🔹 मीडिया और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर दबाव:
प्रेस पर हिंसा, पत्रकारों पर हमले और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर व्यवस्थित दबाव से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ (मिडिया) को कमजोर किया जा रहा है।

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🔹 आर्थिक बुनियाद कमजोर:
बांग्लादेश आर्थिक संकट से जूझ रहा है जहाँ बैंकिंग प्रणाली में डिफॉल्ट लोन की दर बहुत उच्च है — जिससे लोकतांत्रिक शासन की स्थिरता पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ रहा है।

ThePrint Hindi
➡ निष्कर्ष: लोकतंत्र यदि चुनाव के बिना या प्रतिबंधों के साथ चलता है, तो वह महज मतदान का ढकोसला बन जाता है — असली लोगों की भागीदारी मर जाती है।
🇳🇵 नेपाल — युवा क्रांति और तंत्र की दरक

🔹 जनता का उभार:
सितम्बर 2025 में नेपाल में “Gen-Z विरोध आंदोलन” ने व्यापक समर्थन हासिल किया — सोशल मीडिया प्रतिबंध, भ्रष्टाचार और बेरोज़गारी के खिलाफ सड़कों पर युवा उतरे, संसद पर कब्ज़ा किया गया, कई सरकारी भवनों को आग लगाई गई, और प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा।

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🔹 राजनीतिक अस्थिरता:
प्रदर्शनकारियों की मांगों के बाद संसद भंग हो गई और इंटरिम सरकार का गठन हुआ — जिसका मतलब है लोकतंत्र की प्रक्रिया बाधित हो गई थी।

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🔹 राजतंत्र समर्थक संघर्ष:
दूसरी ओर मार्च 2025 में एक अलग आंदोलन में प्राचीन राजतंत्र को फिर से बहाल करने की मांग भी उभरी, जो लोकतांत्रिक विधाओं और परंपरावाद के बीच संघर्ष को स्पष्ट करती है।

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➡ निष्कर्ष: जब लोकतंत्र के माध्यम निष्पक्ष और सुचारु रूप से काम नहीं करते, तो युवा और जनता अपने तरीके खोजने लगती हैं — कभी सड़कों पर, कभी पुरानी संस्थाओं की ओर लौटकर।
🇱🇰 श्रीलंका — लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था का संघ-तंत्र

🔹 जनताको विद्रोह:
2022 में श्रीलंका में जनता ने बड़े पैमाने पर आंदोलन किया, जब राजपक्षे सरकार आर्थिक संकट और महंगाई का सामना नहीं कर सकी और अविश्वास का सामना करती हुई सत्ता से हट गई।

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🔹 लोकतंत्र की अमर्यादित परीक्षा:
महंगाई, विदेशी ऋण और राजनीतिक विफलता के कारण नागरिकों ने अपने मत के अधिकार का प्रयोग केवल चुनावों के रूप में नहीं, बल्कि सड़कों पर करके शासन को चुनौती दी।

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➡ निष्कर्ष: लोकतंत्र केवल मतदान से परिभाषित नहीं होता; यदि शासन व्यवस्था जनता की मूल समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रही, तो लोगों का विश्वास गिरता है, और संकट गहरा होता है।
📊 वैश्विक और क्षेत्रीय विश्लेषण

📌 संस्थागत विफलता:
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोवाल कहते हैं कि बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में शासन परिवर्तन का कारण “खराब गवर्नेंस (प्रशासन की अक्षमता)” था, जो लोकतंत्र की संस्थाओं को कमजोर कर देता है।

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📌 लोकतंत्र में गिरावट:
क्षेत्र में लोकतंत्र की विफलता सिर्फ लापरवाही का परिणाम नहीं — यह जनता की अपेक्षाओं और शासन क्षमता के बीच गहरा अंतर है, जिससे असंतोष मजबूती से उभरता है।

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🧠 क़ानूनी और सामाजिक तथ्य — पंजाब केसरी स्टाइल
📌 जब लोकतंत्र सुचारु न रहे — तंत्र बदल जाता है
राजतंत्र, गणतंत्र और लोकतंत्र का इतिहास सिखाता है — जब न्यायिक प्रक्रिया, मीडिया स्वतंत्रता, और संस्थागत जवाबदेही कमजोर होते हैं, तो जनता की आवाज़ उग्र हो जाती है और शासन तंत्र में उथल-पुथल आती है।

📌 कानूनी स्थिरता बनाम संस्थागत पतन
विधानिक ढांचा तभी सफल होता है, जब:
न्यायपालिका स्वतंत्र हो
मीडिया पर विचार-अभिव्यक्ति की आज़ादी कायम रहे
जनता को सशक्त महसूस हो
अधिकारियों की जवाबदेही तय हो
अगर इनमें से कोई भी स्तंभ कमजोर होता है तो लोकतन्त्र संकट में पड़ जाता है — जैसा कि बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका के हालात दिखाते हैं।

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🧾 संपादकीय निष्कर्ष
दक्षिण एशिया का लोकतंत्र आज “कागज़ पर मजबूत” है, लेकिन ज़मीन पर कमजोर” है। लोकतंत्र की असली ताकत जनता की भागीदारी, निष्पक्ष न्याय और स्थिर प्रशासन में निहित है, न कि केवल चुनावों में।
जहाँ शासन व्यवस्था जनता की अपेक्षाओं को पूरा नहीं करती, वहाँ राजनीतिक अस्थिरता और विद्रोह उभरता है।
लोकतंत्र केवल मत देने का नाम नहीं है — यह रोज़मर्रा के जीवन में न्याय, स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व की गारंटी है।

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